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2025-11-04 07:56:04 UTC

राज on Nostr: बृहदारण्यकोपनिषद २॰१ भाष्य। ॰ ...

बृहदारण्यकोपनिषद २॰१ भाष्य। ॰ मुख्यब्रह्मविदा अजातशत्रुणा अमुख्यब्रह्मविद्गार्ग्यो ॰ ॥१४॥ प्रतिलोमं ॰ उपगच्छेत् शिष्यवृत्त्या ॰ एतदाचारविधिशास्त्रेषु निषिद्धम्। तस्मात् तिष्ठ त्वम् आचार्य एव सन्। विज्ञपयिष्याम्येव त्वामहम् ॥१५॥ अर्थात शास्त्र निषेध मानकर गुरु बने बिना विज्ञप्त किया।